बहुत दिनों बाद अनगढ़ की ठीया पर जाने का अवसर मिला। पहुंचे तो देखा मंडली जमी हुई है। नन्हें, बबलू, लच्छू और लालता अनगढ़ को घेरे बैठे हैं। पीछे खड़े शिबु और मंगल गलबहियां डाले अनगढ़ की बात सुन मुस्किया रहे हैं। साईकिल के कैरियर पर बैठे मनगढ़ एक पैर गली की ज़मीन पर और एक पैर चौथरे की सीढ़ी पर टिका गली में आने जाने वालों को गंभीरता से नापजोख रहे हैं और मंडली की बात में शामिल भी है और नहीं भी। बगल के मंदिर की घंटी बज रही है और पुजारी जी मानस की चौपाई गुनगुना रहे हैं। अनगढ़ की आवाज़ इन सबके बीच से छनकर आ रही है। बात सीता मैया की दुखभरी कहानी पर हो रही है।
" अरे रे --- सीता मैया के जइसन तो कोई नहीं --- ढेर कस्ट सहलीं --- कस्टन का अंत नहीं "
" पर गुरू , राम जी ठीक नहीं कइलन, सारा दोस माई पर लगा कर " लच्छू ने सर के बालों में हाथ फेरते हुए कहा।
" आखिर ओ तो भगवान रहे, सब खबर नं रखते हुई हैं ? " नन्हें चिहुंके।
" भगवान रहे त का, अइलन त मनुज अवतार में नं ? कुछ मरजादा में उनहुँ के रहे के परी ? " लालता समझाने लगे।
"ये कौन बात हुई ? मरजादा के क्या मतलब हैं ?" शिबू उखड़कर बोला।
"यही मतलब है कि समाज में जो रिवाज़ है, उसके सन्दर्भ में हर काम और निर्णय का एक सही और नैतिक जवाब होना होता है।" मनगढ़ ने साईकिल के हैंडल पर कुछ झुकते हुए कहा।
" भाई, राम जी ने जो किया उसे सही या गलत कहने वाले हम कौन है ? हम या तो उनके जितने बड़े हों या एकदम्मे मूढ़ हों, तो कुछ कहें भी। हम तो दूनों नहीं हैं " अनगढ़ ने धीरे से कहा।
"तो फिर हम क्या करें? क्या चुप्पी मार जायें, कुछ बोले ही नाही ? " लच्छू ने अनगढ़ की ओर सवाल किया।
" राम जी के राज में क्या गलत हुआ और क्या सही इस पर सोचने और बतियाने के लिए तोहरे पास ढेर टाइम हौ नं लच्छू। ई काम तू पुजारी जी के जिम्मे छोड़ा नं । ओन्हें त इहै कमवै हव। तू एहू पर सोचबा कि आज क राजा का करत हव अउर ओके का करे के चाही ? " मंगल ने लच्छू का गमछा खींचते हुए कहा।
"आज क राजा भी तं सीता मैया के बेदखल करत हौ ? सीता मैया तं धरती माई में समां गइलीं । अउर ई राजा हौ कि ओनके कंपनी के हाथ बेचत हौ । मैया कहाँ जायें ? मैया के सारे बिटवा, किसान, आदिवासी सब सर पटक-पटक कर रोवत हउवें, सब जने मिलकर राजा के समझावत हउवें , पर राजा हव कि मानत नाही। " अनगढ़ का दर्द छलक पड़ा।
"हम्मै राजा बना दा त हमहूं बताइब कि का करे के चाही " लच्छू पलट कर बोले।
सभी ठठाकर हंस पड़े " अबे, तैं फटीचर राजा बनबे ?"
"काहे न बनी ? " अनगढ़ की आवाज़ चीरती हुई आई। "लच्छू ऐसा राजा बनने का दावा करें जो किसान की जमीन को छीनने की मनाही करदे । लेकिन लच्छू जी ऐसा सोचें तब नं । "
" कां लच्छू , अब बोला, किसान की ज़मीन ले लेना पाप हौ कि नाही ?" मनगढ़ ने लच्छू को ठेला।
लच्छू ने अंत में अपनी बात कह दी "राजा लै चाहे सेठ लै, किसी भी और काम के लिए किसान की ज़मीन लेना, पाप है , पाप के अलावा कुछ नहीं । सीता मैया क अउर कस्ट अब देखल न जात हव "
बनारस में घूमते हुए जैसे तरह तरह के लोग मिलते हैं - कलाकार, जोकर, कवि, गप्पी, साधू, चोर, दार्शनिक, अनगढ़, मनगढ़ इत्यादि, वैसे ही कई तरह के जानवर भी मिलते हैं.
कुछ बड़े विचारमग्न हो, सड़क पर बैठे मिलते हैं.
या कुछ ऐसे कि जानबूझ कर लोगों को परेशान करने के लिए बीच सड़क पर बैठे/खड़े हों.
घने कोहरे की शाम । मोहल्ले की चाय की दुकान पर भीड़ लगी है । लोगों के मुँह से और चाय के प्याले से भाप उठ रही है। आज माहौल जरा भारी है। कल ही गंगाजी में एक नाव डूबी है। बहस चल रही है की जो लोग डूब कर मर गए क्या उन्हें बचाया जा सकता था? प्रोफ़ेसर साहब कह रहे है की प्रशासन अगर मुस्तैद हो तो ऐसी घटनाएं न हो। जब हवा चल रही हो तो नाव पानी में न जाने दे। मल्लाहों का क्या ? वो तो पैसा कमाने के लिए तूफानी नदी में भी नाव उतार दें । कल्लू चाय वाले को यह बात पची नही । उसने मुड़कर सभासद रामलाल साहनी की ओर देखा और बोला "का भाई, तोहरो भी एहौ ख्याल बा? " "काहे? हम का बिसबिदालय में पढ़ल हैं जौन सबके दोस बांटी? दुर्घटना तो हो ही जाला। बाकि कलिया जौन दू महारारू और एक बच्चा डूब गयलन ओकर हमहू के बड़ा कष्ट बा।" "परसासन का जौन गलती बा उनसे बड़ा गलती त एन परफेसेर क हौ। " आपन नटई उचका के अनगढ़ बीच ही में बोल देहलन । प्रोफ़ेसर गरम हो कर बोले " गजब बात करते है , भाई इसमें हमारी क्या गलती हो सकती है? " कल्लू के हाथ रुक गए। बात उसके भी समझ में नही आई। उसने प्रश्नवाचक मुद्रा में अनगढ़ की ओर देखा। "अनगढ़ बे सिर पैर की बात कर रहे हैं ।" ब्रिजेन्द्र सिंह , महापालिका में कर्मचारी है, बोले। प्रोफ़ेसर साहब ने दोष प्रशासन पर ही मढा था लेकिन ब्रजेन्द्र उनकी रक्षा में खड़े हो गए। रामलाल साहनी के मन की गहराई में कहीं हलचल हुई । अनगढ़ की बात का अर्थ लगाने की कोशिश करने लगे। लेकिन उनका दिमाग इस भाव के समर्थन में कोई तर्क नहीं गढ़ पा रहा था । "अनगढ़वा ऐसे ही अंडबंड बोलता है। न कद देखा, न पद देखा , बस बिना सोचे समझे मुँह खोल दिया। " एक वकील साहब प्रोफ़ेसर की मदद में उतर आए। " जल पुलिस के पौडी न आई त का होई ? " वकील साहब की ओर गरदन टेढी कर अनगढ़ ने पूछा। अब एक शिक्षक मैदान में उतर आए। कहने लगे "मल्लाहन का बचाव जिन कर अनगढ़। मल्लाहन की गलती पुलिस पर जिन थोपा । " अनगढ़ थोड़ा आराम से बैठ गए और कल्लू से एक और चाय मांगी। तब तक मनगढ़ पहुंचे। मित्रों ने बताया की माजरा क्या है। अनगढ़ विचार है तो मनगढ़ उनकी भाषा। बात इधर उधर की होती रही और मनगढ़ ने ऐलान कर दिया की अनगढ़ सही है । तभी अनगढ़ बोल पड़े " अगर पर्फेसरन के एतना तनख्वाह और सुबिधा न मिले त औरहूँ के ज्ञान क परतिस्ठा समाज में होई। " कुछ लोगों के सर पर से पानी जाने लगा। अनगढ़ की दो बातों का आपस में क्या सम्बन्ध है? एक तेज़तर्रार राजनैतिक कार्यकर्ता जो अब तक केवल देख-सुन रहा था बोला "भइया बतिया मामूली न हव। दो महारारून अउर एक बच्चा का प्रान गयल ह । एनकर ओनकर इज्जत चाहे परतिस्ठा का सवाल न हव। जौन सही बात हव ऊ सामने आये ही के चाही।" प्रोफ़ेसर और वकील के चहरे पर खिल्ली उडाने वाली हँसी खेल गई। मनगढ़ बोले "बात हलके से कोई नहीं ले रहा है। देखा भाई, मल्लाहन का अपन साइंस होले । इ बतिया मनबा त अनगढ़ हु क बात समझ में आई। पानी या नदी का जैसन जानकर मल्लाह होलन, अउर कौनो ना होत। प्रोफ़ेसर साहब अंग्रेज़ी पढ़ावलन, ओन्हें हुनर की बतिया न समझ में आवला, पर ज्ञानी ओनही के मानल जाला अउर बतिया ओनही के चलेला। जबले कारीगरन क बिद्या पढ़ल-लिखल लोगन के बराबर नाही मानल जात तबले अज्ञानी के भी जिम्मेवारी की नौकरी मिलत रही अउर ऐसन दुर्घटना होत रही। गंगाजी क किनारा मल्लाहन के हवाले कर दा तब देखा कैसन परिवर्तन होला? " रामलाल सहनी को इस बात से जोर आ गया। वे बोले " जेनके पौडी न आवला ओनके हर महिना के अंत में १०-१५ हज़ार हाथ में रख जात हौ। अउर जे पानी के बिसेसग्य हौवें ऊ सबेरे से साम तक नाव चलावलन तब्बो ३-४ हज़ार से ज्यादा न कमा सकत हौव. ऐसे में का होई? " "भाईजान, ई कालेज में पढ़ाई जाने वाली बिद्या ना हव। पढाव ना पढाव महीने के महीने पैसवा मिलबैकरी। मल्लाहन के काम में रिक्स बा। ख़ुद के जान की रिक्स पे दूसरे क जान बचाए वाली बिद्या हौ। मामूली बात ना हव।" अनगढ़ ने प्रोफेसर , वकील अउर नगर पालिका के कर्मचारी की ओर नज़र घुमाते हुए कहा। प्रोफ़ेसर साहब गुस्से में खड़े हुए और चल दिए।
रह-रहकर कौंध जाती है एक तस्वीर... शाम के धुंधलके में बूढों के तानें और रिरियाते बच्चों से घिरी बाट तकती दो आंखें। बेकल मन से उठती हूक डुबा दे , एक गरम चाय के प्याले में।
साथियों के साथ गर्मजोशी मालिकों के साथ रस्साखेंची राजनैतिक सरगर्मी बहसों का सैलाब जीवन का संग्राम और कल के लिए नई सोच नया जोश और नया ... आओ दोस्त, एक प्याला और